Antarvasana-hindi-kahani [2025]
वह रोने लगी। लेकिन दर्द से नहीं — राहत से।
और मीरा फिर से जागी। antarvasana-hindi-kahani
सवेरे के चार बजे थे। शहर अभी सो रहा था, लेकिन मीरा की आँखें खुल चुकी थीं। बगल में पति आलोक गहरी नींद में था। मीरा ने धीरे से करवट बदली और खिड़की से बाहर देखा। अंधेरा पिघल रहा था, जैसे कोई धीरे-धीरे परदा हटा रहा हो। antarvasana-hindi-kahani
वह बिस्तर से उठी, चाय बनाने चली गई। चाय की केतली चढ़ी, तभी उसकी नज़र पुरानी डायरी पर पड़ी जो किताबों के बीच दबी थी। उसने डायरी खोली। पन्ने पीले पड़ चुके थे। एक जगह लिखा था: antarvasana-hindi-kahani
सुबह हुई। उसने कैनवस को फिर से अलमारी के पीछे छुपा दिया। लेकिन इस बार उसने डायरी में कुछ लिखा: